सर पर छत आसमान की

सर पर छत आसमान की,
चलने को ज़मीं जहान की ।

तुम जितना चाहो उड़ सकते हो,
अगर चाहत हो उड़ान की ।

तुम दिलों में रहना सिखो,
तो ज़रूरत नहीं मकान की ।

जब भी मिलो मुस्कुरा कर मिलो,
कोई किमत नहीं मुस्कान की।

खुद की ज़िन्दगी के लिए शुक्रगुजार बनो,
जब कोई सवारी दिखे श्मशान की ।

कायनात से मुहब्बत करो दुश्मनों से दोस्ती,
इंसानियत महकेगी जैसे ख़ुशबू हो लोबान की ।

खुदा को रखो दिल में ,
क्या ज़रूरत मन्दिर-मस्ज़िद आलीशान की ।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

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