कौन कहता है

कौन कमबख्त कहता है बदल जाने को,
मैं नही कहता इश्क में हद से गुजर जाने को।
ये जरूरी तो नहीं की तेरी मुहब्बत मुक्कमल हो,
दुनियां में और भी चीजें है कुछ कर गुजर जाने को।।

आशीष रसीला

Ashish Rasila

जिस्म दिखाना बाकी था

यूं तो बेताब हर कोई था उसे अपना बनाने को,
मगर तैयार कोई नहीं था हद से गुजर जाने को।

हमने उसे खुदा मान कर  बुतों सा पूजा ,
एक मनचला ले गया उसे जन्नत दिखाने को।

अब तलक उस आशिक ने चेहरा देखा था,
जिस्म दिखाना बाकी था अभी हवस मिटाने को।

छोड़ो यार अब इसके बाद मुहब्बत नहीं करेंगे ,
दुनिया में और भी गम हैं दिल से लगाने को ।

अब मेरे हुजरे मैं बस एक ही दिया बाकी था ,
अभी मेरे शहर के सारे खुदा बाकी थे मनाने को।

लोग खुदको तो हमेशा ही अच्छा कहते हैं ,
बस वो बुरा कहते हैं तो ग़म-ख़्वार जमाने को।।

आशीष रसीला

Ashish Rasila

किताबों में मिलूं

मैं मर गया तो शायद इन किताबों में मिलूं ,
एक नज़्म बनकर शायद तेरे होठों पर खिलूँ ।

मुझे ढूंढने से बेहतर तुम मुझे महसूस करना,
शायद हवा की खुशबू में सिमटा हुआ मिलूं।

तुम मेरी लिखी हुई किताबों को गौर से पढ़ना ,
मुमकिन है मैं मेरी तहरीर में सलकता हुआ मिलूं।

तुम मेरे लगाए हुए पेड़ों के पास कुछ देर बैठना,
शायद सर्दी में ठिठुरता,गर्मी में  तप्ता हुआ मिलूं।

हो सके तो मेरी बातें,मेरे लतीफे हमेशा याद रखना,
किसी दिन तेरे रोते चेहरे पर मैं हंसी बन कर खिलूँ ।।

आशीष रसीला

Ashish Rasila

काग़ज़ पर चांद उतारा है

पहली बार काग़ज़ को आईने सा निहारा है,
तेरी तस्वीर को नज़्म बना काग़ज़ पर उतारा है ।
चमक उठेगा काग़ज़ का नसीब यकीन मानो ,
कागज़ के पन्ने पर हमने आज चांद उतारा है । ।

आशीष रसीला

मैं इतना बुरा भी नहीं

मैं इतना बुरा भी नहीं जितना तुम लोगों को बताती हो,
तुम इतनी अच्छी भी नहीं जितना तुम बन कर दिखाती हो।
खैर छोड़ो, मैं यहां तुम्हारे ऐबों को गिनवाने नहीं आया,
बस कहना चाहता हूं, की तुम मुझे याद बहुत आती हो।।

आशीष रसीला

Ashish Rasila

पसीने की खुशबू

मेरी माँ को पिता के पसीने की खुशबू अच्छी लगती है,
गांव में बच्चों को दादा-दादी की कहानी अच्छी लगती है।

शहर की चौड़ी सड़कों पर लोग रोंध दिए जाते है,
मुझे मेरे गाँव की छोटी कच्ची सड़कें अच्छी लगती है।

मेरे गांव के पागल लोग पिपल की पूजा करते हैं ,
हमें ऐसे अंधविश्वास की समझदारी अच्छी लगती है।

शहर के फुटपातों पर गरीब लोगों का बेसरा है ।
मुझे गाँव में कुछ गज जमीं की जमीदारी अच्छी लगती है।

आपको आपका मोटर कार मुबारक हो साहिब ,
हमको तो बैलगाड़ी की सवारी अच्छी लगती है।

जिस पढ़ाई से गांव में शहर की नीव रख दी जाए ,
ऐसी पढ़ाई से अनपढ़ रहने को बीमारी अच्छी लगती है।।

आशीष रसीला

कुदरत के लहजे में

कुदरत के लहजे  में कुछ उबाल आया है,
बहुत दिनों बाद हवा में उझाल आया है ।

हवा पहाड़ से कुछ कंकर गिरा कर बोली ,
जरा ध्यान से मेरी हथेली पर बाल आया है।

इन्तहा हो गई ऐ-खुदा तुझको आना चाहिए ,
तेरे चाहने वालों की ज़िंदगी पर सवाल आया है।

मेरी दोनों चप्पल अमरूद के पेड़ पर लटकी हैं,
पहली बार पेड़ पर चढ़ने का ख्याल आया है।

काले बादल भी आए मगर  बारिश नहीं हुई,
हवा छोटा झोंका बादलों को खंगाल आया है।

मेरे गांव की लड़कियां सज सवर कर बैठी हैं,
मुमकिन है शहर से कोई  जमाल आया है।

वो मुझे तबाह करने की ताक में बैठा है,
ये इश्क एक अजीब सा भ्रम पाल आया है ।

मुझे एक लम्हा गुजरने पर नींद नहीं आती,
लोग खुश होते हैं की नया साल आया है ।।

आशीष रसीला

Ashish Rasila

पीपल का पत्ता

मैं अक्सर देखता हूं
सड़क के किनारे
पीपल के पेड़ पर
एक छोटा हरा पत्ता
पेड़ की टहनी से
उंगली झुड़ाने की ज़िद करता है
हवा उसके सपनो को हवा
देकर उसको परिंदों सा
उड़ने का ख्वाब देती है
मां जानती है उससे उंगली
छुटने पर वो जमीं पर
गिर जाएगा
उसका मुलायम बदन फिर
उसके सामने ही
मुसाफिरों के पांव के तले कुचला जायेगा
मां जमीं पर पड़ी
सूखे पत्तों की लाशें दिखा
उसे डराती है मगर
वो बहुत ज़िद्दी है
वो अब भी हवा के आने पर
ज़िद करता है
उसे लगता है हवा नहीं
वो खुद उड़ता है
अजीब सा वहम पाले है
क्या हम इंसान भी ऐसें हैं ?

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila