जिंदगी तवायफ़ सी लगी

गम अपनों सा खुशियां अपनी होकर भी पराई सी लगी ,
हमें सादा जिंदगी बेहतर, बाकी सब मोह माया सी लगी।

तूफान के बाद  एक टूटे हुए  हरे दरख़्त  ने  मुझसे  कहा ,
उसका यूं तुफां में गिरना उसे खुदा की एक साजिश लगी।

हर जगह झूठ,खुला कत्लेआम ये दुनिया जहन्नुम लगती है ,
मगर एक  बच्चे  को हंसता  देखा  तो दुनियां अच्छी लगी।

यूं तो हमको  हमारा  दुश्मन   ज़रा  भी  पसंद  नहीं,  मगर
वो मुझसे बेहतर बनना चाहता है ये बात हमको अच्छी लगी।

अब  इससे  बड़ा रोज़गार  हमको कहां मिल  सकता था,
हमारी ज़िदंगी के यहां जिंदगी जीने के लिए नौकरी लगी।

आप  हमसे  से  ना  ही  पूछिए  तो  बेहतर  होगा  साहब ,
हमको तो मौत जीवन साथी  ज़िन्दगी  तवायफ सी  लगी ।।

आशीष रसीला

Ashish Rasila

हम जवाब क्या देते

हम उसको अपनी मुहब्बत का हिसाब क्या देते,
जवाब खुद ही सवाल पूछे तो हम ज़वाब क्या देते…

एक मासूम बच्चे ने तितली के पंखों को नोच डाला,
अब उसकी नादानी का हम उसको सिला क्या देते…

पहली बार आंखो ने सच को झूठ बोलते देखा,
अब हम अपनी बेगुनाही का सबूत क्या देते….

जिस शख्स की चाहत में हमने दुवाएं मांगी हों,
अब उसकी बेवफाई में हम उसे  बद्दुआ क्या देते…

जो कुछ दूर तक अपनी जुबां पर ना चल सके,
ऐसे अपाहिज को हम अपना सहारा क्या देते…

जो समंदर सारी नदियां पी कर भी प्यासा हो,
उसकी प्यास में आंख का एक आंसू क्या देते …

तुफान में जख्मी होकर एक परिंदा जमी पर गिरा,
हम खुद टूटकर बिखरे थे तो हौंसला क्या देते…

कुछ रास्तों के बारे वो हमसे अक्सर पूछते थे,
जिन रास्तों पर गए नहीं तो मशवरा क्या देते …

मौत मेरे घर की दहलीज पर मेरे इंतजार में थी,
अब हम अपनी जान ना देते तो भला क्या देते…

आशीष रसीला

गैरों की सलाह नहीं मागतें

अपनों के मसलों पर गैरों की सलाह नहीं मांगते,
ज़िंदगी जीने के लिए किसी की राय नहीं मांगते।

जो तेरा अपना है वो तेरे हर हाल में तेरे साथ होगा,
छोड़ जाने वालों के लिए कभी फ़रियाद नहीं मांगते।

इस दुनियां को अच्छा कहना या बुरा बहुत मुश्किल है,
हजारों चीटियां रोंथ कर लोग माफी तक नहीं मांगते ।

यूं तो ज़मीं पर बैठा हर इंसान अपनी खरियत मांगता है ।
मिलता सिर्फ उनको है जो कभी खुद के लिए नहीं मांगते।।

***आशीष रसीला***

वो जरूर आएगी

मुझे ढूंढने की कोशिश में वो जरूर आएगी,
आंखें मलती हुई खाली हाथ लौट जाएगी।

मेरे कमरे में बस भिखरी हुई किताबें होंगी,
वो हमेशा की तरह उन्हें सजाकर लौट जाएगी।

मुमकिन है कुछ आदतें मेरी अब भी जिंदा हो,
किताबों की धूल उसके बदन से लिपट जाएगी।

तुम हमेशा की तरह इस बार नाराज मत होना।
ये मेरी पुरानी आदत है आसानी से नहीं जाएगी।।

आशीष रसीला

Ashish Rasila

जिस्म दिखाना बाकी था

यूं तो बेताब हर कोई था उसे अपना बनाने को,
मगर तैयार कोई नहीं था हद से गुजर जाने को।

हमने उसे खुदा मान कर  बुतों सा पूजा ,
एक मनचला ले गया उसे जन्नत दिखाने को।

अब तलक उस आशिक ने चेहरा देखा था,
जिस्म दिखाना बाकी था अभी हवस मिटाने को।

छोड़ो यार अब इसके बाद मुहब्बत नहीं करेंगे ,
दुनिया में और भी गम हैं दिल से लगाने को ।

अब मेरे हुजरे मैं बस एक ही दिया बाकी था ,
अभी मेरे शहर के सारे खुदा बाकी थे मनाने को।

लोग खुदको तो हमेशा ही अच्छा कहते हैं ,
बस वो बुरा कहते हैं तो ग़म-ख़्वार जमाने को।।

आशीष रसीला

Ashish Rasila

पसीने की खुशबू

मेरी माँ को पिता के पसीने की खुशबू अच्छी लगती है,
गांव में बच्चों को दादा-दादी की कहानी अच्छी लगती है।

शहर की चौड़ी सड़कों पर लोग रोंध दिए जाते है,
मुझे मेरे गाँव की छोटी कच्ची सड़कें अच्छी लगती है।

मेरे गांव के पागल लोग पिपल की पूजा करते हैं ,
हमें ऐसे अंधविश्वास की समझदारी अच्छी लगती है।

शहर के फुटपातों पर गरीब लोगों का बेसरा है ।
मुझे गाँव में कुछ गज जमीं की जमीदारी अच्छी लगती है।

आपको आपका मोटर कार मुबारक हो साहिब ,
हमको तो बैलगाड़ी की सवारी अच्छी लगती है।

जिस पढ़ाई से गांव में शहर की नीव रख दी जाए ,
ऐसी पढ़ाई से अनपढ़ रहने को बीमारी अच्छी लगती है।।

आशीष रसीला

कुदरत के लहजे में

कुदरत के लहजे  में कुछ उबाल आया है,
बहुत दिनों बाद हवा में उझाल आया है ।

हवा पहाड़ से कुछ कंकर गिरा कर बोली ,
जरा ध्यान से मेरी हथेली पर बाल आया है।

इन्तहा हो गई ऐ-खुदा तुझको आना चाहिए ,
तेरे चाहने वालों की ज़िंदगी पर सवाल आया है।

मेरी दोनों चप्पल अमरूद के पेड़ पर लटकी हैं,
पहली बार पेड़ पर चढ़ने का ख्याल आया है।

काले बादल भी आए मगर  बारिश नहीं हुई,
हवा छोटा झोंका बादलों को खंगाल आया है।

मेरे गांव की लड़कियां सज सवर कर बैठी हैं,
मुमकिन है शहर से कोई  जमाल आया है।

वो मुझे तबाह करने की ताक में बैठा है,
ये इश्क एक अजीब सा भ्रम पाल आया है ।

मुझे एक लम्हा गुजरने पर नींद नहीं आती,
लोग खुश होते हैं की नया साल आया है ।।

आशीष रसीला

Ashish Rasila