लौट कर ना आना

‌मैं तुमको भूल जाऊंगा मगर याद तुम भी ना आना ,
तुम्हारे रास्ते तुम्हें बुलाते हैं तुम लौट कर ना आना।

मैं अब जैसा भी हूं मुझे मेरे हाल में रहने दो ,
मुझे याद रहेगा तेरे अफसानों में हमारा फ़साना ।

तुम हुई हो हक़ीक़त से रूबरू तो अब मलाल कैसा,
मुझे याद करके यूं मेरी तरह अपने दिल को तड़पाना ।

मैंने तुमको छोड़ कर तुम पर एक एहसान किया है ,
तुम मुझे छोड़कर एक एहसान मुझ पर भी जताना ।

मैं समझ चुका हूं, बस अब दिल को है समझाना,
लौट कर मैं भी ना आऊंगा लौट कर तुम भी ना आना ।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

सर पर छत आसमान की

सर पर छत आसमान की,
चलने को ज़मीं जहान की ।

तुम जितना चाहो उड़ सकते हो,
अगर चाहत हो उड़ान की ।

तुम दिलों में रहना सिखो,
तो ज़रूरत नहीं मकान की ।

जब भी मिलो मुस्कुरा कर मिलो,
कोई किमत नहीं मुस्कान की।

खुद की ज़िन्दगी के लिए शुक्रगुजार बनो,
जब कोई सवारी दिखे श्मशान की ।

कायनात से मुहब्बत करो दुश्मनों से दोस्ती,
इंसानियत महकेगी जैसे ख़ुशबू हो लोबान की ।

खुदा को रखो दिल में ,
क्या ज़रूरत मन्दिर-मस्ज़िद आलीशान की ।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

कोई पढ़ता है कुरान

पत्थरों के शहर में शीशे का एक मकान ,
सब लोग अच्छे हैं यहां, बस बुरा है भगवान ।
काफिरों की बस्ती में किसी ने नेकी कर डाली,
मुमकिन है यहां  कोई पढ़ता है कुरान ।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

अब रो चुके बहुत

अब रो चुके बहुत, अब तो हंसना चाहिए ,
जो हुआ सो हुआ, अब आगे बढ़ना चाहिए ।

जब आयेगी  मौत, तब देखा जाएगा ,
अभी ज़िन्दगी को ज़िन्दगी की तरह जीना चाहिए ।

एक पहाड़ से टकराकर हवा जख्मी हुई,
अब तूफ़ानों को भी अपना हुनर आजमाना चाहिए।

ये आसमां में चांद रोज निकलता है ,
ज़मीं पर भी एक चांद निकलना चाहिए।

सूरज तपता रहता है मेरे सर पर,
इन अंधेरों का भी कोई चिराग़ जलना चाहिए।

बहुत हूंआ इंतजार अब ज़ान निकलने को है,
अब खुदा को मुझ से आकर मिलना चाहिए ।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

समंदर नदियां खा गया

ये समंदर भी ना जाने कितनी नदियां खा गया,
आज परिंदो की पंचायत है, पेड़ फल खा गया।

हर अजीब बात पर ताज़्जुब नहीं किया करते ,
वो चोरों को सजा देगा जो चोरी का माल खा गया ।

सब कारवां यहां – वहां भटकते  हैं ,
एक मुसाफ़िर मंजिलों का रास्ता खा गया ।

जब सोया तो आसमान में चांद – तारे सलामत थे,
जागे तो  सूरज चांद- तारों की रोशनी खा गया ।

एक इल्ज़ाम मुझ पर ज़िदंगी ने लगाया है ,
मैं कुछ करता नहीं हूं यूं ही आधी उम्र खा गया ।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

दिल टूट का बिखरा है

दिल टूट कर बिखरा था अब जोड़ लिया हमने,
इश्क़ हाल पूछने आया था मुस्कुरा दिया हमने ।

बस दूर से ही नज़रों ने उनको घर तक छोड़ा, ,
अब की बार उनका पीछा नहीं किया हमने ।

वो मेरी आखिरी भूल थी जो मुझको याद है ,
फिर उसके बाद इश्क़ नहीं किया हमने ।

क्या हुआ अगर मुहब्बत की अदालत में हम मुज़रीम ठहरे ,
मगर दोस्तों की अदालत में मुक़दमा जीत लिया हमने ।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

मिजाज नाजुक हैं

मिजाज नाजुक हैं,  मगर बातें दिल पर लगी ,
दिल साफ है उनका, ये बात हमको अच्छी लगी।

नज़रें टिकी थी महफ़िल की उनपर ,
खुदा की रहमत थी, जो निगाहें हमपर रुकी ।

उसने जिस्म मिला, मगर मुहब्बत ना हुई ,
ये बात उनसे ज्यादा, हमारे दिल पर लगी ।

जिसने हमको मांगा, हम उनको ना मिले ,
जिसको हमने चाहा वो हमको ना मिली ।

छोड़ आएं हैं जब से हसीनाओं की महफ़िल हम,
फिर उसके बाद रास्ते में हमें कोई दीवार ना मिली। ।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

गणतंत्र दिवस

ऐ हिन्द- ए – ज़मीं मर कर भी हम तुझको ही गले लगाएंगे,
मौत जब आवाज देगी तेरी गोद में ही सर रख सो जाएंगे ।

तू फ़िक्र ना कर तेरे पास रहेंगे तेरी ख़ाक में मिल जाएंगे,
ख़ुशबू बन फूलों में खिलेंगे , खाद बन फसलों में लहराएंगे।

ऐ वतन तेरे शान खातिर सौ जन्म भी कम लगे,
तेरे इश्क़ में पागल हम शहीद जवान फिर से वापिस आयेंगे ।

मौत का हमें डर नहीं जीने की आरज़ू तेरे साथ ,
एक ख़्वाब हमसब ने देखा, हम तिरंगे में लिपटकर आयेंगे ।

भारत तेरी आज़ादी के खातिर जिन वीरों का ख़ून बहा,
गणतंत्र दिवस के मौके पर हम उनकी गाथा गायेंगे ।

ऐ वतन तेरी शान ऊंची, तिरंगा ऊंचा लहराएंगे ,
भारत तू स्वतंत्र है , हम गणतंत्र दिवस मनाएंगे ।।
***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

नज़्म जवां हुई

नज़्म जवां हुई, आज लिखने में ग़ज़ल सी लगी,
चांद एक सुंदर लड़की, रात सांवली औरत सी लगी।

चांद महफ़िल में ‘उमराव  जान’ बनकर बैठा है,
मुझको ये सूरज को पटाने कि तरकीबें लगी ।

मेरी एक ग़ज़ल मुझे मुस्कुरा कर देखती  है,
मुझे उस की तबियत कुछ ठीक नहीं लगी।

कल सुबह सूरज देर से निकला  था ,
मुझे इसमें कोई शरारत चांद की लगी ।

आख़िर तूने मुस्कुरा कर देख ही लिया ज़िदंगी,
सच कहूं तो तेरी मुस्कुराहट मुझे अच्छी लगी ।।
***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

किताबें

किताबें……!
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ये ऐसी ख़ुशबू ,जो कहीं ओर से ना आए ,
ये वो ख़ुशबू ,जो सिर्फ किताबों से आए।

कुछ ऐसी बातें, जो किसी और को ना बताए,
जो उसके करीब हो, वो सिर्फ उसको बताए ।

तुम हाथ मिलाओ, तो वो बाहें फैलाए,
अगर किताबें हो दोस्त, कोई दिल तोड़ कर दिखाए ?

ये ऐसी मुहब्बत, जी भरने को ना आए ,
उसकी ऐसी दोस्ती, दुनिया देखती रह जाए।

उसके ऐसे मशवरे, कभी हंसाए तो कभी रुलाए ,
दुनियां के हर दर्द का, जब वो इलाज बताए ।

जब बिखरे पन्ने, तब वो  जुल्फ़ें सजाए ,
अगर कोई सादा दिल देखे , तो प्यार हो जाए।

खुदा करे, ये  गुनाह  कभी मुझ से ना हो जाए ,
जान निकल जाती है, वो हाथ से जब झूट जाए।।
***आशीष रसीला***

Ashish Rasila